सुंदरकांड पाठ विधि: घर पर सुंदरकांड कैसे पढ़ें, कितना समय लगता है, किस दिन और नियम

सुंदरकांड गोस्वामी तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस के सात सोपानों में से पाँचवाँ सोपान है। इसमें हनुमान जी का समुद्र लाँघना, लंका में सीता जी को खोजना, लंका दहन और राम जी के पास लौटना है, और यह सेना के समुद्र तट पर पहुँचने पर समाप्त होता है। इसमें 60 दोहे, चौपाई की 526 पंक्तियाँ, 6 छंद और आरंभ के 3 संस्कृत श्लोक हैं। स्थिर गति से बोलकर पूरा पाठ आमतौर पर लगभग एक से दो घंटे में होता है। अधिकतर परिवार इसे मंगलवार या शनिवार को पढ़ते हैं, जो परंपरा से हनुमान जी के दिन हैं।

सुंदरकांड एक नज़र में

रचयितागोस्वामी तुलसीदास, अवधी में (रचना आरंभ 1574 ई.)
किसका भागश्रीरामचरितमानस, सात में से पाँचवाँ सोपान
छंद3 श्लोक · 60 दोहे · चौपाई की 526 पंक्तियाँ · 6 छंद
पूरे पाठ का समयलगभग 1 से 2 घंटे, गति के अनुसार
सामान्य दिनमंगलवार और शनिवार; हनुमान जयंती, राम नवमी, गृह प्रवेश या किसी भी कठिन समय में

तैयारी कैसे करें

  1. स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। साफ़ आसन पर बैठें, हो सके तो पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके।
  2. छोटी चौकी सजाएँ: साफ़ कपड़े पर श्री राम, सीता जी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी का चित्र।
  3. दीपक जलाएँ: घी या तिल के तेल का, चाहें तो धूप भी।
  4. सरल भेंट: फूल, अक्षत, और यदि आपके परिवार में चढ़ाया जाता है तो चमेली के तेल में सिंदूर। प्रसाद में अक्सर गुड़-चना, लड्डू या बूंदी।
  5. संकल्प: दाएँ हाथ में थोड़ा जल लें, अपना नाम और पाठ का उद्देश्य बोलें, और जल छोड़ दें।
  6. पुस्तक को चौकी या कपड़े पर रखें, सीधे ज़मीन पर कभी नहीं।

पाठ का क्रम

  1. श्री गणेश की वंदना और संकल्प।
  2. हनुमान चालीसा (कई परिवार पहले पढ़ते हैं)।
  3. सुंदरकांड के आरंभ के तीन संस्कृत श्लोक, शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं से।
  4. सुंदरकांड, पहली चौपाई जामवंत के बचन सुहाए से दोहा 60 और अंतिम छंद तक।
  5. हनुमान जी की आरती, फिर प्रसाद।
  6. पाठ में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना।

कई घरों और मंदिरों में पाठ ढोलक और मंजीरे के साथ मिलकर गाया जाता है: चौपाइयाँ एक लय में, और दोहे सब मिलकर।

परंपरा के नियम

  • किसी प्रसंग के बीच में न रुकें। उठना पड़े तो अगले दोहे तक पूरा करके उठें।
  • साफ़ बोलें, न बहुत तेज़ न बहुत धीमे। शुद्ध उच्चारण से ज़्यादा श्रद्धा मायने रखती है।
  • देवनागरी पढ़ने में कठिनाई हो तो अंग्रेज़ी लिप्यंतरण से पढ़ें।
  • परंपरा एक बैठक में पूरे पाठ की है। अर्थ समझने के लिए रोज़ थोड़ा-थोड़ा भी पढ़ सकते हैं; दोहों पर स्वाभाविक विराम हैं।

कोई एक ही सही तरीका नहीं है। हर घर और क्षेत्र की अपनी रीति है; आपके परिवार की रीति अलग हो तो वही मानें।

सुंदरकांड स्वयं क्या कहता है

सुंदरकांड का अंतिम दोहा, सुनने वाले हर व्यक्ति के लिए तुलसीदास जी का आशीर्वाद है:

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान ।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ॥

“श्री रघुनाथ जी का गुणगान सब सुमंगलों को देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनते हैं, वे बिना जहाज़ के ही संसार-सागर पार कर जाते हैं।”

ध्यान दें, शब्द है सादर, यानी आदर के साथ। परंपरा में समझ और श्रद्धा का महत्व है, गति का नहीं।

अर्थ के साथ पढ़ें

हम में से ज़्यादातर लोग सुंदरकांड पढ़ते हैं पर अधिकतर पंक्तियों का अर्थ नहीं जानते। The Complete Book of Sundarkand में हर श्लोक, चौपाई, दोहा और छंद मूल अवधी में, आसान अंग्रेज़ी लिप्यंतरण और हर पद के स्पष्ट अंग्रेज़ी अर्थ के साथ है। 12 प्रसंगों में, हर प्रसंग से पहले कथा का सार, साथ में पाठ विधि, हनुमान आरती और दोहा-सूची। किताब अंग्रेज़ी में है, अवधी पद देवनागरी में। तुरंत PDF, 160 पृष्ठ, ₹299।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुंदरकांड पाठ में कितना समय लगता है?

स्थिर गति से बोलकर पढ़ने पर आमतौर पर लगभग एक से दो घंटे। संगीत के साथ सामूहिक पाठ में अधिक समय लग सकता है।

सुंदरकांड किस दिन पढ़ना चाहिए?

मंगलवार और शनिवार परंपरा से हनुमान जी के दिन हैं, और अधिकतर परिवार इन्हीं दिनों पढ़ते हैं। इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है।

सुंदरकांड में कितने दोहे और चौपाइयाँ हैं?

60 क्रमांकित दोहे (दोहा 39, 49 और 56 में दो-दो, और दोहा 12 सोरठा है), चौपाई की 526 पंक्तियाँ, 6 छंद और 3 संस्कृत श्लोक।

क्या सुंदरकांड थोड़ा-थोड़ा करके पढ़ सकते हैं?

परंपरा एक बैठक में पूरे पाठ की है, पर समझने के लिए रोज़ एक भाग पढ़ना भी ठीक है। प्रसंग के बीच में नहीं, किसी दोहे पर रुकें।

क्या सुंदरकांड पाठ के लिए पंडित जी ज़रूरी हैं?

नहीं। कोई भी घर पर श्रद्धा से पढ़ सकता है। विशेष अवसर पर कई परिवार पंडित जी या भजन मंडली को बुलाते हैं।

परिवारों और क्षेत्रों की परंपराएँ अलग होती हैं; जहाँ आपकी अलग हो, अपनी परंपरा मानें। पाठ से जुड़ी मान्यताएँ यहाँ परंपरा के रूप में दी गई हैं, वचन के रूप में नहीं।